
सूरत के ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से समृद्ध गोपीपुरा क्षेत्र में आज आस्था, श्रद्धा और तीर्थ रक्षा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जब प. पू. खतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभूश्वरजी की पावन निश्रा में “तीर्थ रक्षा हेतु सहस्त्रकणा पद यात्रा संघ” का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
इस पद यात्रा में हजारों की संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं, युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्म के प्रति अपनी अटूट आस्था और समर्पण का परिचय दिया।
सुबह से ही गोपीपुरा क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय बन चुका था। विभिन्न उपाश्रयों और जैन संघों से श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण कर, हाथों में धर्म ध्वजाएं और मुख पर नवकार मंत्र का जाप करते हुए पद यात्रा स्थल पर पहुंचने लगे। पूरे क्षेत्र में “जय जिनेन्द्र”, “तीर्थ रक्षा हमारा धर्म” और “नवकार मंत्र” की गूंज सुनाई दे रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा गोपीपुरा धर्ममय वातावरण में डूब गया हो।
पद यात्रा का शुभारंभ मंगलाचरण और नवकार मंत्र के उच्चारण के साथ हुआ। प. पू. आचार्य श्री जिनमणिप्रभूश्वरजी महाराज साहेब के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। आचार्य भगवंत की पावन उपस्थिति ने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
यात्रा के दौरान श्रद्धालु अनुशासनबद्ध पंक्तियों में चलते हुए तीर्थ रक्षा का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहे थे। कई स्थानों पर समाज के लोगों ने पुष्पवर्षा कर पद यात्रियों का स्वागत किया। गोपीपुरा क्षेत्र के विभिन्न मार्गों पर रंगोली, स्वागत द्वार और बैनर लगाए गए थे, जिन पर तीर्थ संरक्षण और धर्म जागृति के संदेश लिखे गए थे।
इस अवसर पर अपने प्रेरणादायी प्रवचन में आचार्य श्री जिनमणिप्रभूश्वरजी ने कहा कि जैन तीर्थ केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और अहिंसा के संदेश के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तीर्थों की सुरक्षा और संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। प्रत्येक श्रावक का यह परम कर्तव्य है कि वह तीर्थ रक्षा के लिए तन, मन और धन से योगदान दे।
आचार्य भगवंत ने कहा कि तीर्थों की रक्षा केवल पत्थरों और मंदिरों की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी आत्मिक पहचान और धार्मिक विरासत की रक्षा है। यदि आने वाली पीढ़ियों को धर्म और संस्कारों से जोड़ना है तो हमें आज से ही तीर्थों के प्रति जागरूक होना होगा। उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से आह्वान किया कि वे धर्म और संस्कृति की इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
पद यात्रा के दौरान महिलाओं और युवाओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। महिलाएं भक्ति गीत गाते हुए यात्रा में शामिल थीं, वहीं युवा धर्म ध्वज लेकर अनुशासन और व्यवस्था संभालते नजर आए। छोटे बच्चों ने भी “तीर्थ रक्षा” लिखी तख्तियां हाथों में लेकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
इस यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं, बल्कि समाज में तीर्थों के महत्व और उनकी सुरक्षा के प्रति चेतना जागृत करना था। समाज के अग्रणियों ने बताया कि आज के समय में कई प्राचीन तीर्थ उपेक्षा और विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में समाज को संगठित होकर तीर्थ रक्षा के लिए आगे आना होगा।
गोपीपुरा क्षेत्र के निवासियों ने भी इस आयोजन का हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया। जगह-जगह पेयजल, शरबत और अल्पाहार की व्यवस्था की गई थी। अनेक परिवार अपने घरों के बाहर खड़े होकर पद यात्रियों का अभिनंदन कर रहे थे। पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और सामाजिक एकता का सुंदर वातावरण देखने को मिला।
यात्रा के दौरान कई स्थानों पर नवकार मंत्र का सामूहिक जाप किया गया। श्रद्धालुओं ने एक स्वर में तीर्थ रक्षा का संकल्प लिया। वातावरण इतना शांत और आध्यात्मिक था कि हर व्यक्ति धर्म भावना से ओत-प्रोत दिखाई दे रहा था।
समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि सहस्त्रकणा पद यात्रा का आयोजन वर्षों से तीर्थ संरक्षण और धर्म जागृति के उद्देश्य से किया जाता रहा है। इस प्रकार के आयोजन समाज को एक सूत्र में बांधने के साथ-साथ नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ने का कार्य करते हैं।

यात्रा के समापन अवसर पर आचार्य श्री जिनमणिप्रभूश्वरजी ने सभी श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने कहा कि जब समाज एकजुट होकर धर्म और तीर्थ रक्षा के लिए आगे बढ़ता है, तब सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आता है। उन्होंने सभी से अपने जीवन में अहिंसा, संयम और सेवा के मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया।
समापन के बाद श्रद्धालुओं ने गुरु वंदन कर धर्म लाभ लिया। पूरे आयोजन में अनुशासन, भक्ति और सेवा भावना का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। आयोजन समिति द्वारा व्यवस्था और सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए थे, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुई।
इस भव्य पद यात्रा ने यह संदेश दिया कि जैन समाज अपने तीर्थों, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा के लिए सदैव जागरूक और प्रतिबद्ध है। गोपीपुरा की गलियों में गूंजते नवकार मंत्र और धर्म ध्वजों की छटा ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
धर्म, संस्कृति और एकता के इस अनुपम संगम ने न केवल समाज को प्रेरित किया, बल्कि नई पीढ़ी के मन में भी तीर्थों के प्रति श्रद्धा और जिम्मेदारी की भावना जागृत की। “तीर्थ रक्षा हेतु सहस्त्रकणा पद यात्रा संघ” का यह आयोजन लंबे समय तक श्रद्धालुओं के मन में आध्यात्मिक स्मृति के रूप में अंकित रहेगा।




