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श्री कलेश्वरि माता मंदिर परिसर के एतिहसिक पुनजर्गरन हेतु सुरत मे भव्य “श्री श्याम चले ननिहाल” किर्तन संध्या

कलेश्वरि धाम का एतिहासिक मह्त्त्व

सूरत: महीसागर जिले की अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित प्राचीन एवं पवित्र मां कालेश्वरी माता मंदिर परिसर, गुजरात की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक धरोहर में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आज इस पवित्र धाम के पुननिर्माण एवं पुनर्जागरण के महा – संकल्प को साकार करने हेतु सूरत शहर में भय भजन संध्या का आयोजन किया गया है।

मां कालेश्वरी का यह पवित्र स्थान महीसागर जिले के खानपुर तहसील के लवण गांव की सीमा में स्थित हैं, जिसे प्राचीन काल में “हिडिंबा वन ” के नाम से जाना जाता था।

इस धाम का इतिहास 10 वीं से 15 वीं शताब्दी तक विस्तृत माना जाता हे , और यहां आज भी अनेक प्राचीन अवशेष इससे गौरवशाली अतीत के सदस्य प्रस्तुत करते हैं।

परिसर में स्थित प्रमुख ऐतिहासिक स्थल:
भीम चोर
अर्जुन चोरी
प्राचीन शिव मंदिर
प्राचीन मंदिरों के अवशेष एवं शिल्पकला

 

यह स्थान महाभारत काल के अज्ञातवास से भी संबंधित माना जाता हैं, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।

मां कालेश्वरी, मां जगदंबा का एक दिव्य स्वरुप मानी जाती हैं, जो महीसागर के गुप्त एवं पवित्र क्षेत्र में विराजमान हैं। यह स्थान प्राचीन काल से ही भक्ती ओर साधना केंद्र रहा हैं।

कथानुसार, जब वीर बर्बरीक जी ( खाटु वाले श्यामजी) की माता मोरवी गर्भवती थीं, तब उन्होंने इस पवित्र स्थान पर मां कालेश्वरी की सच्चे मन से आराधना की थीं। उनकी भक्ती से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।


बाद में वीर बर्बरीक जी ने महीसागर संगम स्थल पर चौदह देवियों को कठोर साधन की।
इन चौदह देवियों में मां कालेश्वरी को प्रमुख स्वरुप माना जाता है।

ऐसा भी कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में कुछ समय व्यतीत किया था । यह स्थान “हिडिंबा वन” के नाम से प्रसिद्ध था ओर आज “ कालेश्वरी परिसर ” के रुप में जाना जाता हैं।

मां कालेश्वरी की महिमा अत्यंत महान मानी जाती हैं। सच्चे मन से की गई उनकी पूजा प्रत्येक भक्त की मनोकामना पूर्ण करती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृध्दि प्रदान करती हैं

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